4:13 pm - Sunday April 22, 2018

​*दीवाली पर घर रोशन करने की तैयारी में जुटे कुम्हार*

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_*दीपों का महापर्व दीपावली  जैसे-जैसे करीब आ रहा है वैसे ही लोगों का घर रोशन करने की तैयारी में कुम्हार जुट गए हैं। छोटे-बड़े दिए, मिट्टी के घरौंदे, रंग-बिरंगे खिलौने समेत तमाम आकर्षक वस्तुएं बनाने में कुम्हारों के परिवार व्यस्त हैं।*_.                                        लेकिन इन सब के बीच उनके चेहरे पर चिंता की झलक साफ़-साफ़ नजर आ जाती है।चिंता इस बात की, कि बाज़ार में उनका माल सही दाम पर बिकेगा कि नहीं?कहीं विदेशी माल के आगे मिट्टी से बनी चीजों की मांग कम न हो जाए?                     *हाशिये पर आये कुम्हार व्यापार*
सस्ती और चमक-दमक से भरपूर चीनी झालर, बल्ब और साज-सज्जा की अन्य वस्तुओं ने बाज़ार को पूरी तरह से जकड़ रखा है।ऐसे में मिट्टी के पार परिक दिए कहीं न कहीं अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं।साल दर साल घटती मांग से कुम्हार लंबे समय से मिट्टी के उत्पादों का व्यापार कर रहे व्यापारी भी अब हाशिये पर हैं। बीते कई वर्षों से मिट्टी की वस्तुएं बनाने वाले सन्तोष प्रजापति बताते हैं कि पहले हर घर में हम लोग सैकड़ों दिए लोगों को बेंचते थे।इनकी उचित कीमत भी हमें मिल जाती थी लेकिन अब लोग बाज़ार से शगुन करने भर के दिए ले आते हैं।अब लोग ज्यादातर तो मोमबत्ती व झालरों से काम चला लेते हैं।इससे मांग में काफ़ी असर पड़ा है।वहीं राकेश प्रजापति कहते हैं कि अब न तो पहले जैसी बिक्री रही और न ही लोग मिट्टी के उत्पादों में रूचि लेते हैं।ऐसे में हमारे सामने रोजी-रोटी चलाने का संकट भी खड़ा हो गया है।इस खत्म होती परम्परा कि ओर सरकार का भी ध्यान आपेक्षित है । यह धंधा खत्म होने कि कगार पर पहुँच चुका है।      *चाईनीज़ झालरों के आगे फ़ीकी पड़ी दिए की चमक*
बाज़ार में उपलब्ध सस्ती चाईनीज़ झालरों के आगे दिए की चमक फ़ीकी पड़ती जा रही है।वहीं चीनी मिट्टी से बने उत्पाद भी बाज़ारों में देसी मिट्टी के उत्पादों की मांग घटा रहे हैं।                                    *धंधा बदलने को मजबूर हैं कुम्हार*
बाज़ार में घटती मांग और सरकार की उपेक्षा झेल रहे कुम्हार अपना धंधा बदलने को मजबूर हैं।उनका कहना है कि इस धंधे में जितनी मेहनत है उतना फायदा नहीं है।कई बार लागत वसूल पाना भी मुश्किल हो जाता है।इस से बेहतर मजदूरी है।जहां दिन भर कि मेहनत के बाद, शाम को  परिवार की भूख मिटाने लायक दिहाड़ी तो मिल जाती है।ज्यादा मेहनत और कम मुनाफ़ा होने के कारण नई पीढ़ी भी इस धंधे में नहीं आना चाहती।          *सरकार से सहयोग की आस*
हाशिये पर पहुँच चुका कुम्हार वर्ग सरकार से सहयोग की आस लगाए हुए है।अगर सरकार इनकी ओर ध्यान दे तो डूबती हुई परंपरा को एक बार फिर बाज़ार में नई पहचान मिलने की उम्मीद है।       *इस दीवाली मिट्टी के दिए से रोशन करें अपना आशियाना*
क्यों न इस दीवाली विदेशी, खासतौर से चीनी उत्पादों को दरकिनार कर मिट्टी के दिए से अपना आशियाना रोशन किया जाए। धार्मिक दृष्टि से भी सरसों के तेल और घी से जलाए जाने वाले यह दिए हमेशा से शांति, समृद्धि एवं वैभव का प्रतीक माने जाते हैं।

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